चार नवंबर 2018 को पटना के गांधी मैदान में दिल्ली के संसद भवन की प्रतिकृति दिख रही थी या यूं कहें कि
दिखाने की कोशिश की जा रही थी. लेकिन यहां न फ़िल्म की शूटिंग चल रही थी और न ही कोई प्रदर्शनी. बल्कि निषाद समुदाय के लोगों का जुटान हुआ था.
बॉलीवुड
फ़िल्मों के सेट डिजाइनर और खुद को 'सन ऑफ़ मल्लाह' कहने वाले मुकेश सहनी
ने इसी दिन अपने हज़ारों समर्थकों की मौजूदगी में एक नई राजनीतिक पार्टी
बनाने की घोषणा की और पार्टी का नाम रखा गया वीआईपी. यानी विकासशील इंसान
पार्टी.'वीआईपी' का मतलब समझाते हुए मुकेश कहते हैं, "लोकतंत्र में वीआईपी वही होता जिसके पास अधिक लोग होते हैं. क्योंकि हम बिहार की 14 फ़ीसदी से अधिक अतिपिछड़ी आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैं. इसलिए हम वीआईपी पार्टी हैं."
'वीआईपी' को बने अभी बमुश्किल पांच महीने भी नहीं हुए हैं. पार्टी की घोषणा के वक्त उन्होंने कम से कम 20 सीटों पर चुनाव लड़ने की बात कही थी लेकिन महागठबंधन का हिस्सा बनने पर उनके खाते में बिहार की 40 में से तीन लोकसभा सीटें आई हैं.
इस एलान के बाद से यह चर्चा आम है कि पांच महीने पहले बनी इस पार्टी को इतना महत्व क्यों दिया जा रहा है और ये तीन सीटें किस आधार पर उन्हें दी गई हैं. जबकि जीतन राम मांझी की हिन्दुस्तानी अवाम मोर्चा (हम) को भी इतनी ही सीटें मिली हैं.
लेफ्ट पार्टियों में से सीपीआई-एमएल को मिली एक सीट को छोड़कर बाकी सीपीआई और सीपीआई-एम को गठबंधन से किनारे का रास्ता दिखा दिया गया.
इस सवाल के जवाब में मुकेश सहनी कहते हैं, "तीन तो कम ही मिली हैं. हमारी मांग अधिक की थी. चूंकि हम मौजूदा एनडीए सरकार को हराने के लिए प्रतिबद्ध हैं, इसलिए तीन पर ही समझौता करना पड़ा."
वे कहते हैं, "तीन सीटें कम हैं क्योंकि हमारा प्रतिनिधित्व इससे ज़्यादा है. अतिपिछड़ी जातियों में हमारे समुदाय की भागीदारी सबसे अधिक है. हम 21 जातियों-उपजातियों में बंटे हैं."
"हमारे वोट सरकार बना और गिरा सकते हैं. उत्तर बिहार में हम 15 सीटों पर उम्मीदवारों का भाग्य बदल सकते हैं. और ऐसा नहीं कि ये सिर्फ़ पांच महीने की बात है. हम बीते पांच सालों से अपने समुदाय के लिए संघर्ष कर रहे हैं. 2015 में हमने आंदोलन किया."
आज महागठबंधन के साथ खड़े सहनी के राजनीतिक जीवन की शुरुआत एनडीए के साथ हुई थी. लोकसभा चुनाव 2014 में वो बीजेपी के स्टार कैंपेनर थे. बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने क़रीब 40 सभाओं में मुकेश को अपने साथ रखा था. उन्हें अपने साथ हर दिन हेलीकॉप्टर में ले जाते और दोनों संयुक्त सभा को संबोधित करते थे.
तो फिर क्या हुआ कि एनडीए का साथ छोड़ दिया?
मुकेश जवाब देते हैं, "क्योंकि तब अमित शाह ने हमसे वादा किया था निषाद समुदाय और उसमें बँटी 21 अन्य जातियों-उपजातियों के लिए विशेष आरक्षण की व्यवस्था करेंगे. बाद में 2015 वे वादों से मुकर गए. इसलिए हमने भी साथ छोड़ दिया."
2015 के विधानसभा चुनाव में मुकेश सहनी ने नीतीश कुमार को सपोर्ट किया था. बाद में उनसे भी अलग हो गए. कहते हैं, "नीतीशजी ने भी हमारे साथ छल किया. उन्होंने भी हमारे समुदाय के आरक्षण और सुविधाओं के लिए शुरू में वादा किया, लेकिन नहीं निभा पाए. अब तो वे खुद बीजेपी के साथ हो गए हैं. इसलिए हमारी लड़ाई उनसे भी है."
राजनीतिक जानकार कहते हैं कि एनडीए के साथ भी मुकेश सहनी की तीन सीटों पर बात पक्की हो गई थी. लेकिन वे उस वक्त आरक्षण की मांग को लेकर अड़े थे. तब बिहार में जेडीयू और आरजेडी के गठबंधन की सरकार थी. उन्होंने सहनी को अपनी तरफ खींच लिया. बाद में सरकार ही टूट गई. फिर मुकेश सहनी तेजस्वी के करीबियों में शामिल हो गए.
आखिर क्या वजह है कि सभी दल सहनी को अपने साथ रखना चाहते हैं?
जवाब वे खुद देते हैं. "हमारी भागीदारी इतनी है कि हमें साथ लेकर चलना ही होगा. केवल निषाद ही नहीं बल्कि बिंड, बेलदार, चाईये, तियार, खुलवत, सुराहिया, गोढी, वनपार और केवट समेत अन्य 21 जातियां-उपजातियां हमारे समुदाय का हिस्सा हैं. कई ज़िलों में हम 17 फ़ीसदी तक हैं."
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